fair & lovely क्रीम में से फेयर शब्द अब और नहीं रहेगा

जार्ज फ्लाँयड की बेरहमी भरी हत्या ने पूरी दुनिया में आक्रोश पैदा कर दिया है। श्वेत- अश्वेत का जो भेदभाव दुनिया में अर्सों से चला आ रहा है, सब उसके खिलाफ जोर- शोर से अपनी आवाज उठा रहे हैं। इसी के साथ-साथ भारत में भी रंग के ऊपर भेदभाव जो होते आ रहे हैं, उससे लोग काफी आक्रोशित हैं।श्वेत रंग के लिए भारत में काफी समय से चली आ रही फेयरनैस क्रीम फेयर एंड लवली के खिलाफ सब ने आवाज उठायी है। और इसके चलते फेयर एंड लवली क्रीम को बनाने वाली ब्रांड हिदुस्तान यूनीलीवर ने एक एहम फैसला लिया है। कंपनी ने कहा है कि अब क्रीम के नाम “ फेयर एंड लवली ” में से उन्होंने फेयर शब्द को हटाने का फैसला किया है।

सिर्फ इतना ही नहीं बल्कि यूनीलीवर ने यह भी फैसला किया है कि वो एसे सारे संदर्भ को क्रीम से हटा देंगे जो क्रीम के सफेदी या लाइटनिंग  से जुड़ी हो। दरअसल माना जा रहा है कि हिंनदूस्तान यूनीलीवर के इस फैसले के पीछे दो कारण माने जा रहे हैं। पहली वजह तो जार्ज फ्लाँयड की हत्या है जिसने दुनिया भर में काफी बड़े पैमाने पर प्रभाव डाला है। तो वही दूसरी तरफ भारत में एक आँनलाइन याचिका निकाला गया था जिसमें “ फेयर एंड लवली “ क्रीम को बैन करने की माँग की गयी थी। इस याचिका को बहुत लोगों ने साईन किया जिसके बाद कंपनी को परिणामसवरुप यह फैसला लेना पड़ा। फेयर एंड लवली का नया नाम क्या रखा जाएगा, ये भी आपको कुछ दिनों में पता लग ही जाएगा। यूनीलीवर का यह भी कहना है कि वो चाहते हैं फेयर एंड लवली को ग्लोबल सतर पर पहचाना जाए। ये क्रीम हर तरह की स्किन पर काम करे।

ब्रांड का नाम सिर्फ सफेदी अर्थात फेयरनैस से ना जुड़े बल्कि हर तरह की स्किन पर काम करे। कंपनी का भी मानना है कि सिर्फ गोरेपन को ही सुंदरता का पैमाना बनाना गलत है बल्कि क्रीम एसी होनी चाहिए जो हर तरह की स्किन पर काम करे। रेगूलेटर से नए नाम के लिए मंजूरी माँगी गयी है जो दो महीने में मिल जाएगी।

काश इस क्रीम के नाम बदलने के साथ- साथ लोगों की श्वेत और अश्वेत के प्रति जो भेदभाव है वो भी खत्म हो जाए। सिर्फ फेयर एंड लवली ही नहीं बल्कि और भी ऐसी क्रीम हैं जिनका नाम  बदला जाएगा।

जबसे ब्लैकलाइफसमैटर मूवमेंट का प्रचलन हुआ सब भेदभाव के खिलाफ अपनी आवाज उठाने लगे। लेकिन दुखद बात तो ये है कि उसमें से एसे काफी थे जिन्होने खुद ही एक समय पर एसी क्रीमस का प्रचार किया हुआ है जो रंग से जुड़े भेद-भाव को और भी बढ़ावा देने का काम करते हैं। भारत में पहले से काफी बदलाव हैं लेकिन कहीं तो कहीं आज भी रंग के ऊपर भेदभाव चला आ रहा है। आज भी लोग गोरे लोगों को पूजते हैं। कोई भी नयूज चैनल खोलिए, ज्यादातर एसे एंकर्स देखने को मिलते हैं जो श्वेत रंग के हों। बहुत ही कम एंकर्स एसे नजर आएंगे जो अश्वेत हों।

सबसे बड़ी दिक्कत तो लोगों की सोच में है जो समझते हैं कि सुंदरता सिर्फ उनमें ही होती है जिनका रंग साफ है और भेदभाव की शुरुआत यहीं से हो जाती है। आवशयक है कि एसी सोच जो रंग भेदभाव का जड़ है उस पर काम किया जाए।

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